सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (एससी एसटी) आरक्षण में क्रीमी लेयर न होने पर सवाल उठाया है। कोर्ट ने पूछा कि क्या एससी एसटी के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से ऊपर उठ चुके लोग अपने ही वर्ग के पिछड़े लोगों का हक नहीं मार रहे हैं। इस मुद्दे पर गुरुवार को करीब आधा घंटे चली गरमागरम बहस के दौरान अदालत ने इसे संविधान पीठ को विचार के लिए भेजे जाने के भी संकेत दिये।

दरअसल सुप्रीम कोर्ट एससी एसटी को प्रोन्नति में आरक्षण का मुद्दा संविधानपीठ को भेजे जाने पर सुनवाई कर रहा है। इसी सुनवाई के दौरान कोर्ट का ध्यान एससी एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू न होने की ओर गया। जस्टिस कुरियन जोसेफ ने मामले में बहस कर रहीं वरिष्ठ वकील इंद्रा जयसिंह से सवाल किया कि एससी एसटी वर्ग में आरक्षण के सहारे अब ऊपर उठ चुके लोगों को इसका लाभ क्यों मिलना चाहिए। एससी एसटी की क्रीमी लेयर को आरक्षण के लाभ से बाहर क्यों नहीं किया जाना चाहिए।

जस्टिस कुरियन के इन सवालों में पीठ की दूसरी न्यायाधीश आर भानुमति ने भी साथ दिया और कहा कि हमारा सवाल है कि जो लोग सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से ऊपर उठ चुके उन्हें आरक्षण का लाभ क्यों मिले जबकि उसी वर्ग के लोग उनसे पीछे छूट गए हैं।

कानून बनाकर सिर्फ संसद ही कर सकती है सूची में संशोधन?
क्या राज्य सरकारें एससी एसटी सूची से ऐसे लोगों को बाहर कर सकती है। वरिष्ठ वकील पीएस पटवालिया ने इसका जवाब देते हुए कहा कि एससी एसटी में पिछड़ेपन का फंडा नहीं लागू होता। एससी एसटी सूची से किसी वर्ग को सिर्फ संसद ही कानून बना कर बाहर कर सकती है।

तो फिर राज्य से मशविरा क्यों?
जस्टिस कुरियन ने फिर पूछा कि अगर राज्य सरकार को कोई हक ही नहीं है तो फिर अनुच्छेद 16 (4)(ए) (प्रोन्नति में आरक्षण) के प्रावधान में राज्य से मशविरे की बात का क्या मतलब है। एससी एसटी में पिछड़ेपन का फंडा न लागू होने की दलील पर कोर्ट का कहना था कि आरक्षण के पीछे सामाजिक न्याय का सिद्धांत तो समान है। इंद्रा जयसिंह ने कहा कि ये राष्ट्रपति तय करते हैं कि कौन वर्ग अनुसूचित जाति सूची में रहेगा और कौन नहीं? सूची से किसी को हटाने का अधिकार सिर्फ संसद को है।

एक ही वर्ग के अंदर ऊपर उठ चुका व्यक्ति क्यों नहीं हो सकता बाहर?
जस्टिस कुरियन का सवाल था कि अगर संसद सूची से किसी वर्ग को हटाती है तो पूरा वर्ग बाहर हो जाएगा। लेकिन उनका सवाल एक ही वर्ग के अंदर के अगड़े और पिछड़ों के बारे में है। ऊपर उठ चुके एक व्यक्ति को बाहर करने के बारे में है ताकि उसी वर्ग का उससे पीछे लाइन में लगा ज्यादा पिछड़ा व्यक्ति आरक्षण का लाभ पा सके।

जयसिंह ने कहा कि एससी एसटी को आरक्षण पिछड़ापन के लिए नहीं दिया गया है बल्कि उसके साथ हुए सामाजिक भेदभाव के लिए है। व्यक्ति कितना भी ऊपर उठ जाए उसकी जाति उसके साथ रहती है। आज भी ऐसे मामले में देखने में आते हैं। उन्होंने कहा कि आरक्षण में सिर्फ पिछड़ेपन की बात नही होती प्रशासन और सत्ता में भागेदारी की भी बात होती है। आखिर संसद में महिलाओं के आरक्षण की बात क्यों चल रही है। या फिर यह क्यों पूछा जाता है कि सुप्रीम कोर्ट मे कितनी महिला जज है। आरक्षण के जरिए प्रतिनिधित्व सुनिश्चित होता है।

एक ही वर्ग के ड्राइवर अौर जज में समानता कैसे?
पीठ अपने सवाल पर कायम रही और फिर पूछा कि क्या एक ही वर्ग के ऊपर उठ चुके लोग उसी वर्ग के पिछड़ों का हक नहीं मार रहे? जस्टिस कुरियन ने उदाहरण दिया कि अगर सुप्रीम कोर्ट का एक जज एससी है और उसका ड्राइवर भी एससी है तो ऐसे मामले में बराबरी और समानता का क्या सिद्धांत होगा? इस पर पटवालिया ने कहा कि कोर्ट का सवाल वाजिब है और ये बहस व विचार का मुद्दा हो सकता है लेकिन आज की तारीख में जो कानून है उसके मुताबिक एससी एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर का फंडा नहीं लागू होता।

कोर्ट इस मुद्दे को भी बड़ी पीठ को विचार के लिए भेज सकता है। जस्टिस कुरियन ने सहमति जताते हुए कहा कि ये मुद्दा भी भेजे जाने योग्य है। मामले में मंगलवार को फिर सुनवाई होगी।

क्या है मामला
कोर्ट एससी एसटी को प्रोन्नति में आरक्षण के लिए पिछड़ेपन के आंकड़े जुटाने की अनिवार्यता के वर्ष 2006 के एम नागराज मामले को पुर्न विचार के लिए पांच न्यायाधीशों से बड़ी पीठ को भेजे जाने पर सुनवाई कर रहा है। एम नागराज के फैसले में पांच जजों ने कहा था कि प्रोन्नति में आरक्षण देने से पहले सरकार को आंकड़े जुटाने होंगे कि आरक्षण पाने वाला वर्ग पिछड़ा है और उसका नौकरियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। मध्य प्रदेश, त्रिपुरा और बिहार ने एससी एसटी को प्रोन्नति में आरक्षण और परिणामी वरिष्ठता रद करने के हाईकोर्ट के फैसलों को चुनौती दी है। लेकिन उनके आड़े एम नागराज का फैसला आ रहा है। इसलिए उन्होंने मामला बड़ी पीठ को भेजने की मांग की है।

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