केंद्र सरकार ने बीते बुधवार को उच्चतम न्यायालय में बताया कि अगर कोई व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ जबरन संबंध बनाता है, जिसकी उम्र 15 साल से अधिक हो तो यह भारतीय दंड संहिता की धारा 374 (बलात्कार) के तहत नहीं आएगा.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार केंद्र सरकार ने कहा कि बलात्कार कानून में यह अपवाद या छूट है ताकि ‘विवाह संस्था’ की रक्षा की जा सके.

एक गैर सरकारी संगठन की ओर से दाख़िल की गई याचिका के जवाब में केंद्र सरकार ने शीर्ष न्यायालय से आग्रह किया कि धारा 375 के तहत सभी नाबालिग चाहे वे विवाहित हो या नहीं, को शामिल करने का आग्रह किया.

वर्तमान में बलात्कार कानून के तहत एक अपवाद 375 (2) है जो कहता है, किसी व्यक्ति द्वारा अपनी पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाना जो कि 15 साल के कम न हो, बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता.

एनडीटीवी इंडिया की ख़बर के अनुसार, उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि फौजदारी कानून में जबरन वैवाहिक यौन संबंध बलात्कार के अपराध में शामिल है या नहीं, इस मुद्दे पर विस्तृत रूप से बहस हो चुकी है और इसे आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता.

रिपोर्ट के अनुसार, ‘शीर्ष अदालत ने जानना चाहा कि क्या संसद में पतियों द्वारा जबरन यौन संबंध से 15 से 18 वर्ष की आयु की वैवाहिक लड़कियों के संरक्षण के पहलू पर चर्चा की गई?

एनडीटीवी इंडिया के अनुसार, न्यायालय ने यह भी पूछा कि क्या अदालत उन वैवाहिक लड़कियों के अधिकार की सुरक्षा के लिए हस्तक्षेप कर सकती है जिनका उनके पतियों द्वारा यौन शोषण हुआ हो? पीठ ने कहा कि जब 18 साल से कम की लड़की किसी लड़के के साथ भागकर रज़ामंदी से यौन संबंध बनाती है तो लड़के पर बलात्कार का मामला दर्ज हो जाता है.

‘भारत में विवाह कानून 18 साल से कम उम्र की किसी भी युवती को कानूनी तौर पर विवाह की अनुमति नहीं देता है. विवाह के बाहर जाकर अगर कोई नाबालिग सहमति से किसी के साथ संबंध बनाती है तो कानून के मुताबिक इसे बलात्कार माना जाएगा.’

टाइम्स आॅफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, उपर्युक्त दलील देते हुए एनजीओ के वकील गौरव अग्रवाल ने कहा, हम 18 साल से कम की किसी लड़की को पोक्सो अधिनियम के तहत बच्चे के रूप में देखते हैं, लेकिन एक बार उसकी शादी हो जाने के बाद उसे ही आईपीसी की धारा 375 (2) के तहत बच्चा नहीं मानते हैं. यह पूरी तरह से अनुचित है. सच तो यह है कि 15 साल से कम की लड़की को बच्ची के रूप में ही देखा जाना चाहिए, चाहें उसकी शादी हुई हो या नहीं. संसद को बच्चे की रक्षा करनी ही होगी.

उन्होंने कहा, जिस तरह से बालिग होने की उम्र 18 साल तय की गई है उसी तरह से संबंध बनाने के लिए महिला की सहमति की उम्र भी 18 साल लागू होनी चाहिए.

हालांकि केंद्र सरकार की वकील बीनू टाम्ता ने एनजीओ की इस दलील को ख़ारिज करते हुए कहा कि भारत में बाल विवाह एक सच्चाई है और इसलिए विवाह संस्था को बचाया जाना चाहिए नहीं तो ऐसे विवाहों से होने वाले बच्चों को इसका कष्ट भोगना पड़ेगा.

बीनू टाम्ता की दलील सुनने के बाद न्यायमूर्ति मदन बी. लोकुर ने पूछा, ‘क्या इससे बाल विवाह को प्रोत्साहन नहीं मिलेगा?’

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता ने कहा कि सरकार ने दावा किया है कि देश में दो करोड़ 30 लाख दुल्हनें नाबालिग हैं. धारा 375 के अपवाद के प्रावधान को अगर हटाकर देखें तो ऐसे पति आपराधिक मुक़दमा चलाए जाने के योग्य हो जाएंगे.

द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार, उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार से बाल विवाह में शामिल लोगों पर कार्रवाई, बाल विवाह रोकथाम अधिनियम, 2006 के तहत तैनात अधिकारी और ऐसे विवाह से बच्चों पर होने वाले प्रभावों का चिकित्सा रिकॉर्ड का आंकड़ा दो हफ्तों के भीतर पेश करने को कहा है.

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